एक गांव में दो सुरेश राम, पिता के नाम अलग-अलग; फिर भी लाभुक की पहचान में कैसे हुई चूक? शिकायतकर्ता का आरोप—पंचायत सचिव ने नहीं सुनी फरियाद, अब फोन पर भी नहीं मिला जवाब
गिरिडीह: प्रधानमंत्री आवास योजना गरीबों को पक्का घर देने के लिए बनाई गई है, लेकिन जब इसी योजना में लाभुक की पहचान और राशि हस्तांतरण को लेकर सवाल उठने लगें, तो जवाबदेही भी जरूरी हो जाती है। गिरिडीह जिले के तिसरी प्रखंड की चंदौरी पंचायत के चंदौरी गांव में सामने आया मामला कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रहा है। यहां सुरेश राम, पिता बद्री राम ने शिकायत की कि उनके नाम पर स्वीकृत आवास योजना का लाभ दूसरे व्यक्ति को दिया जा रहा है। उपायुक्त के निर्देश पर जिला स्तरीय टीम ने मामले की जांच भी की, लेकिन कथित लापरवाही के लिए जिम्मेदार कर्मियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई, यह स्पष्ट नहीं है।
एक गांव में दो सुरेश राम, फिर सत्यापन की जिम्मेदारी किसकी?
शिकायतकर्ता सुरेश राम ने उपायुक्त को आवेदन देकर मामले की जांच कराने की मांग की थी। इसके बाद जिला समन्वयक अनिल कुमार गांव पहुंचे और मामले की जांच की। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गांव में सुरेश राम नाम के दो व्यक्ति हैं, लेकिन उनके पिता के नाम अलग-अलग हैं। इसी बीच दूसरे सुरेश राम के नाम से प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एफटीओ (FTO) जारी होने और पहली किस्त के रूप में 40 हजार रुपये की राशि हस्तांतरित होने की जानकारी सामने आई।
जिला समन्वयक के अनुसार, योजना की राशि संबंधित लाभुक के खाते के बजाय दूसरे सुरेश राम के खाते में चली गई थी। मामले की जांच कर रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को सौंपने की बात कही गई थी।
अब सवाल यह है कि जब दोनों व्यक्तियों के पिता के नाम अलग-अलग थे, तो लाभुक की पहचान और बैंक खाते का सत्यापन किस आधार पर किया गया? क्या दस्तावेजों की जांच केवल औपचारिकता बनकर रह गई थी, या फिर प्रक्रिया में कहीं गंभीर चूक हुई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब जांच रिपोर्ट और संबंधित अभिलेखों से ही मिल सकता है।
शिकायत के बाद भी नहीं सुलझा सवाल, पंचायत सचिव की भूमिका पर उठे प्रश्न
शिकायतकर्ता सुरेश राम, पिता बद्री राम का आरोप है कि उन्होंने मामले की जानकारी पंचायत सचिव धनेश्वर रविदास को दी थी। उनके अनुसार, पंचायत सचिव ने उन्हें यह कहते हुए लौटा दिया कि वे आवास लेने के योग्य नहीं हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उनकी बात पर उचित कार्रवाई नहीं हुई और उन्हें टाल-मटोल का सामना करना पड़ा।
यदि शिकायतकर्ता के आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह सवाल गंभीर हो जाता है कि शिकायत मिलने के बाद भी लाभुक की पहचान और दस्तावेजों का दोबारा सत्यापन क्यों नहीं किया गया। हालांकि, इस संबंध में पंचायत सचिव का पक्ष सामने आना बाकी है और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
राशि की रिकवरी होगी, लेकिन जवाबदेही का हिसाब कौन देगा?
सरकारी योजना में राशि गलत खाते में जाने की पुष्टि होने पर नियमानुसार वसूली की कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन मामला केवल 40 हजार रुपये की रिकवरी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि लाभुक के चयन, दस्तावेजों के सत्यापन, एफटीओ जारी करने और राशि हस्तांतरण की प्रक्रिया में किन कर्मियों तथा अधिकारियों की क्या भूमिका रही।
सवाल यही है कि सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज करने से लेकर खाते में पैसा भेजने तक पूरी व्यवस्था काम करती है, लेकिन जब नाम और पहचान को लेकर विवाद सामने आता है, तो जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया इतनी धीमी क्यों पड़ जाती है? गरीबों के लिए बनी योजना में गलती होने पर सिर्फ रकम वापस लेने से क्या जिम्मेदारी पूरी हो जाती है?
जांच रिपोर्ट तैयार होने और उसे उच्च अधिकारियों तक भेजे जाने की बात कही गई है। अब जिला प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकले, क्या किसी स्तर पर लापरवाही की पुष्टि हुई और यदि हुई, तो संबंधित कर्मियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।
पंचायत सचिव ने कॉल रिसीव नहीं किया, पक्ष का इंतजार
इस मामले में पंचायत सचिव धनेश्वर रविदास से फोन पर संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
फिलहाल, मामले में जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई का इंतजार है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जांच के बाद सिर्फ फाइल आगे बढ़ेगी या जिम्मेदारी भी तय होगी? प्रधानमंत्री आवास योजना की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पारदर्शिता, सही लाभुक की पहचान और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई जरूरी है।


